
*किसी के द्वारा एक* गलती,दो फिर तीन गलती भी क्षम्य हो सकता है,मनुष्य जीवन है,गलती हो भी क्यों ना ! लेकिन जब वह गलती आदत में शुमार हो जाये। तो फिर तब किसी भी सुरत में ”क्षम्य” नहीं हो सकता जब आप ‘धर्म तंत्र’ में जुडे हों। पीले,सफेद कपडे,जनेऊ और सिर में चुटिया रख लेने से आप सात्विक,धार्मिक नहीं हो जाते। कुछ तो अपने में वो गुरूदेव जिनसे सुक्ष्म रूप में जुडे होते हैं,के आदर्श पर चलेंगे तभी उनका ही नहीं लोगों का सम्मान मिलेगा। वरन आप भ्रष्ट ही कहलाएंगे। फिर ये थोथी प्रशंसा कुछ काम का नहीं है, जहां आपकी कोई ‘आभा’ ही नहीं है।
*और यह आभा* तो पैसे से कतई नहीं खरीदी जा सकती। इसके लिए तो बौद्विक रूप से अपने में परिपक्वता लानी ही होगी। यह जानना और पूरी बेशर्मीपूर्वक सिर झुका कर स्वीकारना ही होगा कि दुनियां में गलत….गलत ही होगा और सच का स्थान अपना ही होगा।
*वरन लोग मंदिर में* स्थापित मुर्ति को मुर्ति ही कहते। मुर्ति कहेंगे तो वहां भगवान ही नहीं हो सकता। दरअसल में हम मानते हैं कि मंदिर में भगवान होते हैं,तब हम प्रणाम करते हैं। ठंड के दिन में तो कपडे पहनाते हैं,तो गर्मी में पंखे की व्यवस्था करते हैं, ग्रहण पर सुरक्षा प्रदान किया जाता है।
*यानि लोगों के* मन में मंदिर में यह भावना है कि यहां भगवान वास करते हैं। किसी धर्म तंत्र से आप जुडे हों तो आपकी छाप उसके आदर्शों के अनुसार कुछ तो हो…! यहां तो आंचलिक समाचार पत्र,अखरों की सुर्खियों में आपके ‘कारनामे की खबर’ लोग पढ रहे हैं,तो जब सार्वजनिक रूप से आप उस जगह खडे हैं,जहां आम वो व्यक्ति जो अपने को धर्मतंत्र से विलग पाता है,उससे भी आप गए गुजरे है। क्योंकि वो नासमझ उस राह पर है,तो आप तो उस परिवार मंच से जुडे हैं,जहां जुडना ही सम्मान के लिए काफी है,लेकिन उस नासमझ से भी आपका कृत्य गया गुजरा है।
*समाजसेवा के कई* क्षेत्र हैं‚जिसमें से लेखन यानि अच्छी बातें लिखकर भी समाजसेवा की जा सकती है‚को मानते हुए अपने पत्रकारिता धर्म का पालन करते हुए हम लिखते हैं‚ लेखन में किसी की भावना को ठेस पहूंचाना हमारा उद्वेश्य नहीं है‚लेकिन सामाजिक विषमताओं पर चुप रहना‚तंज ना कसना किसी दुर्भाग्य से कम नहीं है। यह तो अन्याय देख कर चुप रहने के ही समान है। हर व्यक्ति का अपना अच्छे आदतों कार्यों पर आदर्श भी होना चाहिए कि वो आपकी पहचान बने‚वरन अंतर क्या रहेगा ǃ



