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वॉशिंगटन से दिल्ली तक : एप्सटीन की छाया(आलेख : बृंदा करात, अनुवाद : संजय पराते)

आलेख : बृंदा करात, अनुवाद : संजय पराते

 

एप्सटीन फाइलों से दस्तावेज़ों के जारी होने से केवल एक ही व्यक्ति की विकृति उजागर नहीं हुई है। इन दस्तावेज़ों ने राजनीतिक सत्ता, कॉरपोरेट घरानों, वित्तीय संस्थानों, अति-धनिकों और प्रभावशाली लोगों के बीच के “जुड़ाव” के एक नए मॉडल की काली सच्चाईयों पर भी रोशनी डाली है। वर्ग-आधारित संरचनात्मक गठजोड़ कोई नई बात नहीं है, न ही अपराध और दंडमुक्ति को विशेषाधिकार की तरह उपयोग करना नई बात है। लेकिन ये फाइलें दिखाती हैं कि सड़ांध कितनी गहरी है — निजी लाभ को समर्पित व्यवस्था में नैतिकता के किसी भी दिखावे तक का लोप हो चुका है।

जेफ्री एप्सटीन अपनी कई अन्य निर्योग्यताओं के अलावा बाल यौन शोषण का मनोविकार रखने वाला एक दोषसिद्ध यौन अपराधी था। किसी भी सभ्य समाज में ऐसे व्यक्ति को दंडित किया जाता है और सामाजिक रूप से अलग-थलग कर दिया जाता है। लेकिन अमेरिका— जो दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने का दावा करता है — में उसकी यही विशेषताएं उसे वैश्विक स्तर पर व्यावसायिक संबंध विकसित करने के ऐसे मॉडल को गढ़ने में सक्षम बनाती है, जिसमें युवतियों और बच्चों का यौन शोषण शामिल था। अमेरिका के धनी श्वेत पुरुष, वर्तमान और पूर्व राष्ट्रपति, रूस और यूरोप के बैंकर, पश्चिम एशिया के शेख, और भारत से जुड़े नाम — सभी इन फाइलों में उल्लेखित हैं। यह आवश्यक नहीं है कि जिनका नाम आया है, वे सभी यौन अपराधों पर आधारित “जुड़ाव” में शामिल रहे हों। एप्सटीन की सेवाएँ अनेक प्रकार की थीं और उनमें से सभी यौन नहीं थे। उनका अपराध यह है कि सत्ता में रहने वालों के साथ उनकी निकटता ने उसके इस मॉडल को सामान्य बना दिया था।

*मिलीभगत और पतन*

कई नामित व्यक्तियों के लिए यह उन स्थानों के साझा अनुभवों से जुड़ा था, जहाँ नाबालिगों की तस्करी और यौन शोषण होता था। सहभागिता ने आपसी निर्भरता पैदा की, जिसकी गोंद थी गोपनीयता और मिलीभगत। इंटरनेट पर अब सामने आ रहे ईमेल आदान-प्रदान का सरसरी अध्ययन भी दिखाता है कि यौन विकृति की सांकेतिक भाषा किस तरह व्यावसायिक सौदों, वित्तीय लेन-देन, चेतावनी संकेतों की अनदेखी करने वाले बैंकों, और राजनीतिक-आर्थिक संपर्कों तक पहुँच बनाने के संदर्भों के साथ उलझी हुई थी — जहाँ एप्सटीन दलाल और आपूर्तिकर्ता की भूमिका में था। महिलाओं और बच्चों का यौन शोषण लेन-देन का साधन था — नेटवर्क, मुनाफ़े और सत्ता के निर्माण के लिए। ये फाइलें पूँजीवाद के नैतिक दिवालियापन की झलक दिखाती हैं।

अपराध के विभिन्न कोण हो सकते हैं। कानूनी ढाँचे प्रत्यक्ष अपराध और उकसावे में अंतर करते हैं, और उकसावे की भी अलग-अलग श्रेणियाँ होती हैं। लेकिन 2008 के बाद जो भी एप्सटीन के संपर्क में रहा, उसके लिए अज्ञानता का तर्क देकर बचाव नहीं किया जा सकता है। उसके खिलाफ पहली शिकायत 2005 में तब हुई, जब अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य के पाम बीच में एक माँ ने आरोप लगाया कि उसने उसकी 14 वर्षीय बेटी का शोषण किया। पुलिस जाँच में कम-से-कम एक दर्जन और पीड़ितों की पहचान हुई। निर्णायक कार्रवाई के बजाय, तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश के कार्यकाल में, संघीय सरकार ने उसके प्रभावशाली वकीलों द्वारा आगे बढ़ाए गए एक विशेष गैर-अभियोजन समझौते को स्वीकार कर लिया। एप्सटीन ने “वेश्यावृत्ति के लिए उकसाने और एक नाबालिग” से जुड़े हल्के आरोपों में दोष स्वीकार किया और उसे 13 महीने की सज़ा मिली, जिसके दौरान उसे रोज़ कार्यालय जाने और रात में जेल लौटने की अनुमति थी। अलग-अलग दलों की सरकारों ने पीड़ितों की आवाज़ों की अनदेखी की और उसने दंडमुक्ति के साथ अपनी गतिविधियों को जारी रखा।

पीड़ितों के साहस और निरंतर संघर्ष के कारण ही जुलाई 2019 में उसे उन आरोपों में गिरफ्तार किया गया, जो 2008 के समझौते में शामिल नहीं थे। मुकदमे से पहले अगस्त में उसने कथित रूप से आत्महत्या कर ली। 2002 से 2019 के बीच के ईमेल और दस्तावेज़ अब कई लोगों की संलिप्तताओं के प्रमाण देते हैं। फिर भी, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अधीन न्याय विभाग द्वारा नामों को हटाकर कई शक्तिशाली व्यक्तियों की पहचान सुरक्षित रखी गई है। पीड़ितों ने बार-बार आरोप लगाया है कि यह इतिहास के सबसे बड़े पर्दा-फाशों में से एक को दबाने की कोशिश थी।

*भारत का पक्ष*

अमेरिकी जनता को अपनी संस्थाओं से जवाब माँगना है। भारत में हम न्याय और जवाबदेही की माँग कर रहे साहसी पीड़ितों के साथ एकजुटता व्यक्त करते हैं। लेकिन बात यहीं समाप्त नहीं होती।

ई-मेल में दो भारतीय नाम सामने आए हैं। पहला उद्योगपति अनिल अंबानी का, जिन्हें सत्तारूढ़ नेतृत्व का निकटस्थ माना जाता है। दूसरा नाम हरदीप पुरी का है।

महानुभाव अंबानी और एप्सटीन के बीच के पत्राचार में महिलाओं के प्रति जानी-पहचानी यौन-अपमानजनक भाषा दिखाई देती है। अधिक गंभीर पहलू राजनीतिक पहुँच से जुड़ा है। भारत के प्रधानमंत्री की प्रस्तावित वॉशिंगटन यात्रा से पहले अंबानी महोदय ने लिखा था : “नेतृत्व चाहता है कि जेरेड से मुलाकात करने में आप मेरी मदद करें… शायद मई में प्रधानमंत्री, डोनाल्ड से मिलने के लिए (वॉशिंगटन) डीसी जाएंगे… उसमें भी मदद चाहिए।” यदि ये ई-मेल प्रामाणिक हैं और इन्हें फर्जी नहीं बताया गया है, तो गंभीर प्रशासनिक प्रश्न उठते हैं। एक दोषसिद्ध यौन अपराधी से संवाद में “नेतृत्व” का हवाला क्यों दिया गया? क्या उन्हें ऐसा कहने का अधिकार था? क्या इन दावों की कोई जाँच हुई है?

विदेश मंत्रालय ने इन ई-मेलों में प्रधानमंत्री के संदर्भों को “एक दोषसिद्ध अपराधी की घटिया कल्पना” बताया है। लेकिन प्रश्न एप्सटीन की विश्वसनीयता का नहीं, बल्कि अंबानी महोदय के शब्दों का है। उनके खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई? या क्या वे सचमुच सरकार की ओर से कार्य कर रहे थे? सरकार को जवाब देना चाहिए।

हरदीप पुरी, जो वर्तमान में केंद्र सरकार में मंत्री हैं, ने 2014 के अपने ई-मेल के संदर्भ में एप्सटीन की गतिविधियों की जानकारी न होने का दावा किया है, जबकि उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि उनकी कई मुलाकातें हुईं हैं। एक ईमेल में उन्होंने लिखा है : “प्रिय जेफ़… जब तुम अपने विदेशी टापू से वापस आओगे, तो मुझे जानकारी देना। मैं बात करने के लिए आना चाहूँगा…” और बाद में : “जब तुम वापस आओगे, तो मुझे बुलाना। और, मज़े करना…”। क्या यह अज्ञानता दर्शाता है?

एक पत्रकार वार्ता मे पुरी ने कहा : उसे एक वेश्या और एक नाबालिग महिला से संबंध बनाने के लिए दोषी ठहराया गया था। और बस इतना ही।” “नाबालिग महिला”? क्या उनका आशय एक बच्ची से है? और क्या यह संबंध तोड़ने के लिए पर्याप्त कारण नहीं?

उन्होंने आगे कहा कि “एक महिला सांसद” ने उनसे कहा कि लोग ईर्ष्या करते हैं। यह किस स्तर की सोच को दर्शाता है? क्या यह हमारे जनप्रतिनिधियों की गिरावट को नहीं दर्शाता? उनके शब्द दिखाते हैं कि कुख्यात “विदेशी टापू” पर होने वाली गतिविधियों को भी मज़ाक या ईर्ष्या का विषय बनाया गया है। यह महज़ शब्दों की चूक नहीं, बल्कि बलात्कार-संस्कृति को मजबूत करने वाला दृष्टिकोण है।

यह भारत के लिए शर्म की बात है कि एक केंद्रीय मंत्री ने एक दोषसिद्ध यौन अपराधी से संपर्क बनाए रखा और फिर उसका बचाव किया। क्या उनका पद पर बने रहना प्रधानमंत्री की स्वीकृति का संकेत है?

संसद को एप्सटीन फाइलों पर चर्चा की अनुमति नहीं दी गई। लेकिन भारत की जनता को चर्चा करने से कोई रोक नहीं सकता।

(साभार : द हिंदू। लेखिका माकपा की पूर्व पोलिट ब्यूरो सदस्य तथा महिला आंदोलन की वरिष्ठ नेत्री हैं। अनुवादक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। )

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