
*मैं गलत नहीं, संघर्षरत हूँ*
मैं वहीं हूँ, जो बचपन से लेकर
अपने बुढ़ापे तक शुद्ध हवा और
स्वस्थ ज़िंदगी के सपने बुनता हूँ।
गुनगुनाते पक्षियों की धुन में,
और कल-कल बहती नदियों की शुद्ध धारा में,
अपने सुनहरे भविष्य को देखता हूँ।
माँ की उँगली पकड़ चलना सीखा,
और बाबा से प्रकृति-कोया का संबंध—
उन्हें अपने आराध्य में देखता हूँ।
मैं भी इंसानों में ही गिना जाता हूँ, मगर
समय-समय पर इंसानों में गिने जाने पर
अक्सर उपेक्षित महसूस करता हूँ।
जिस जंगल के बीच मैं पला-बढ़ा,
जहाँ पूर्वज ज़मीदोज़ होकर पेन हुए—
उस जल-जंगल-जमीन को वंदन करता हूँ।
आख़िर गलती मेरी समझ न आई,
मेरी ज़िंदगी में दखलअंदाज़ी न भायी,
मेरी ज़मीन से खदेड़े जाने पर मैं उजड़ जाता हूँ।
आपके नज़रिए से मैं जंगली सही,
पर तुम्हारी सभ्यता को पहले ही नकार चुका हूँ,
क्योंकि मैं प्रकृति-सम्मत मानवता चाहता हूँ।
फिर भी चींटी के घर को छेड़ने पर जैसे उमड़ते हैं,
लोग क्यों भूलते हैं कि मैं तो भला इंसान हूँ—
जल-जंगल-जमीन उजड़ने से डरता हूँ।
तुम फ़िक्र न करो,
साँस लेने के लिए मैं अपने जंगल की हवाएँ
कभी रोक नहीं पाऊँगा।
छोड़ दो मेरी जमीन — यही चाहता हूँ।
कब तक मैं ही गलत कहलाऊँ?
औरों की तरह नमकहराम नहीं, इसलिए
शायद जल-जंगल-जमीन बचाना चाहता हूँ।
✍️ धर्मपाल कोड़ापे
डा विश्राम करन धुर्वे फैंस क्लब
डॉ विश्राम धुर्वे




